शिक्षा का अधिकार डेस्क। हरिद्वार में आज मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी कई विकास योजनाओं की आधारशिला रखने जा रहे हैं। लेकिन जिस संसदीय क्षेत्र में यह कार्यक्रम आयोजित हो रहा है, उसी क्षेत्र के सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत का नाम न तो सरकारी विज्ञापनों में दिखाई देता है और न ही कार्यक्रम के पोस्टरों में। यदि ऐसा है, तो राजनीतिक गलियारों में इसे महज़ संयोग मानना आसान नहीं होगा।

आज के कार्यक्रम में हरिद्वार नगर विधायक मदन कौशिक का नाम कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिए प्रमुखता से अंकित है, लेकिन क्षेत्र के सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत को कार्यक्रम से दूर रखा गया है। इससे यह चर्चा और तेज हो गई है कि क्या यह केवल प्रशासनिक चूक है या इसके पीछे कोई राजनीतिक संदेश भी छिपा है।
दिलचस्प बात यह है कि राजनीतिक हलकों में सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत और कैबिनेट मंत्री एवं हरिद्वार विधायक मदन कौशिक को एक ही राजनीतिक खेमे का माना जाता है। इसके बावजूद सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी आधिकारिक विज्ञापन में मुख्यमंत्री के साथ शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा, पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज और कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मदन कौशिक के नाम प्रमुखता से प्रकाशित किए गए हैं, जबकि हरिद्वार संसदीय क्षेत्र के सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत का नाम पूरी तरह अनुपस्थित है। यही तथ्य राजनीतिक चर्चाओं को और बल दे रहा है।
यह पहली बार नहीं है। इससे पहले पौड़ी गढ़वाल के सांसद अनिल बलूनी के मामले में भी शिलापट्ट पर उनका नाम न होने को लेकर सवाल उठे थे। ऐसे घटनाक्रम विपक्ष से अधिक सत्ता पक्ष के भीतर चल रही खींचतान की चर्चाओं को हवा देते हैं।
त्रिवेंद्र सिंह रावत पिछले कुछ समय से अपने सार्वजनिक बयानों के कारण भाजपा के भीतर ही चर्चा का विषय रहे हैं। संसद और अन्य मंचों पर दिए गए उनके कुछ वक्तव्यों को लेकर पार्टी संगठन असहज दिखाई दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनके इन बयानों से संगठन के भीतर मतभेदों की चर्चा को बल मिला। हालांकि इस संबंध में पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है।
भाजपा लगातार यह दावा करती रही है कि संगठन में कोई गुटबाज़ी नहीं है। लेकिन यदि जनप्रतिनिधियों को सरकारी कार्यक्रमों और प्रचार सामग्री से दूर रखा जाता है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। जनता के बीच भी यही संदेश जाता है कि सब कुछ सामान्य नहीं है।
राजनीति में मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर सहयोगियों की उपेक्षा का आभास पार्टी की एकजुटता पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है। यदि यह महज़ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति है, तो उसका राजनीतिक संदेश भी उतना ही स्पष्ट माना जाएगा।