टीईटी पर व्यंग्य : गुरुजी की परीक्षा क्यों? व्यवस्था की भी तो कोई परीक्षा हो!

तीस साल पढ़ाने वाले गुरुजी को फिर साबित करना होगा कि वे पढ़ाने लायक हैं! डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी और नेताओं की योग्यता की परीक्षा क्यों नहीं?

हरिद्वार।
वाह रे व्यवस्था!

जिस गुरुजी ने जिंदगी के तीस-तीस साल बच्चों को पढ़ाने में लगा दिए, हजारों बच्चों को परीक्षा में बैठाया, उनके परिणाम सुधारे और पीढ़ियां तैयार कीं, अब उसी गुरुजी से कहा जा रहा है—पहले टीईटी पास करके साबित करो कि तुम पढ़ाने लायक हो!

कमाल है साहब!

गुरुजी ने जिंदगी भर परीक्षा ली, अब नौकरी में बने रहने के लिए गुरुजी की ही परीक्षा होगी।

शायद व्यवस्था को लगता है कि तीस साल का अनुभव, शैक्षिक योग्यता, प्रशिक्षण और वर्षों की सेवा सब मिलकर भी उस एक परीक्षा के बराबर नहीं हैं, जिसमें चार विकल्प दिए जाएंगे और एक पर टिक लगाना होगा।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 में लागू हुआ। अब 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को भी टीईटी परीक्षा पास करनी होगी।

यानी जिस गुरुजी ने तब नौकरी शुरू की थी, जब आज के कई टीईटी अभ्यर्थी पैदा भी नहीं हुए थे, अब उन्हीं से कहा जाएगा—

“पहले पात्रता सिद्ध करो!”

गुरुजी सोच रहे हैं—

“साहब, पात्रता तो हमने तीस साल पहले साबित कर दी थी… तभी तो इतने साल से बच्चों को पढ़ा रहे हैं!”


नौकरी में बने रहने के लिए परीक्षा सिर्फ गुरुजी की क्यों?

अगर नौकरी में बने रहने के लिए परीक्षा जरूरी है, तो यह नियम सिर्फ गुरुजी तक ही क्यों?

डॉक्टरों की भी परीक्षा हो?

जो डॉक्टर वर्षों से मरीजों का इलाज कर रहे हैं, उनसे भी कहा जा सकता है—

“डॉक्टर साहब, आपने तीस साल इलाज किया है, बहुत अच्छी बात है… लेकिन अब एक परीक्षा देकर साबित कीजिए कि आपको अभी भी मानव शरीर की जानकारी है!”

इंजीनियरों की भी परीक्षा हो?

सड़क, पुल और इमारत बनाने वाले अनुभवी इंजीनियरों से भी कहा जा सकता है—

“इतने साल काम किया है, ठीक है… लेकिन नौकरी जारी रखने से पहले एक परीक्षा और दे दीजिए।”

अधिकारियों की भी परीक्षा हो?

जो अधिकारी वर्षों से फाइलें चला रहे हैं, नीतियां बना रहे हैं और प्रशासन संभाल रहे हैं, उनसे भी कहा जा सकता है—

“सर, अनुभव अपनी जगह है, लेकिन अब एक परीक्षा देकर साबित कीजिए कि आप अभी भी प्रशासन चलाने योग्य हैं।”

और माननीय नेताओं की?

यह सवाल तो और भी दिलचस्प है।

जनता पांच साल में एक बार परीक्षा लेती है—वोट के रूप में।

लेकिन अगर हर पेशे में योग्यता बनाए रखने के लिए परीक्षा जरूरी है, तो क्या जनप्रतिनिधियों के लिए भी कोई ज्ञान-परीक्षा हो?

मसलन—

संविधान कितने अनुच्छेदों से बना है?
संसद और विधानसभा की शक्तियों में क्या अंतर है?
बजट क्या होता है?
मौलिक अधिकार क्या हैं?
और जिस विभाग की जिम्मेदारी मिली है, उसके मूल कानून कितने याद हैं?

लेकिन नहीं…

परीक्षा का बोझ सबसे सुरक्षित जगह पर डालो—गुरुजी पर।

क्योंकि गुरुजी सवाल पूछ सकते हैं, मगर व्यवस्था से सवाल करने की उनकी बारी कब आएगी, यह कोई नहीं बताता।


गुरुजी के घर में अब नया दृश्य होगा

बेटा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है।
पिता टीईटी की तैयारी कर रहे हैं।
बहू कह रही है—

“पिताजी, मैं आपका ऑनलाइन मॉक टेस्ट लगा देती हूं।”

पोता मोबाइल लेकर समझा रहा है—

“दादाजी, चार ऑप्शन हैं, सही वाला चुनना है!”

गुरुजी मन ही मन सोच रहे हैं—

“हे भगवान! जिस उम्र में पोते को ABCD सिखानी थी, उसी उम्र में खुद A, B, C, D के चक्कर में फंस गया हूं!”


अनुभव का प्रमाणपत्र भी चाहिए?

सबसे बड़ा व्यंग्य तो यह है कि जिस शिक्षक ने वर्षों तक बच्चों को समझाया—

“बेटा, परीक्षा तुम्हारी योग्यता का एक हिस्सा है, पूरी योग्यता नहीं।”

आज वही शिक्षक व्यवस्था से पूछ रहा है—

“तो फिर मेरी पूरी सेवा, मेरा अनुभव, मेरी शैक्षिक योग्यता और मेरे वर्षों का काम किस खाते में जाएगा?”

परीक्षा हो, योग्यता का आकलन हो, गुणवत्ता सुनिश्चित हो—इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

लेकिन सवाल यह है—

“गुणवत्ता की चिंता सिर्फ शिक्षक के लिए ही क्यों?”

क्या व्यवस्था की भी समय-समय पर परीक्षा नहीं होनी चाहिए?

नीति बनाने वालों की परीक्षा,
नीति लागू करने वालों की परीक्षा,
व्यवस्था चलाने वालों की परीक्षा
और सबसे आखिर में…
उस व्यवस्था को पढ़ाने वाले गुरुजी की परीक्षा!

विडंबना देखिए—

गुरुजी को पढ़ाने की योग्यता साबित करनी है, लेकिन जिस व्यवस्था ने उन्हें तीस साल पढ़ाने दिया, उसकी व्यवस्था कितनी गुणवत्तापूर्ण थी—इसकी परीक्षा कौन लेगा?


आखिर में गुरुजी से एक सवाल…

कल तक बच्चों से कहते थे—

“परीक्षा से डरना मत, तैयारी रखो।”

अब बच्चे गुरुजी से कहेंगे—

“गुरुजी, घबराइए मत… आप भी कर लेंगे!”

गुरुजी मुस्कुराएंगे और कहेंगे—

“बेटा, जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा तो तीस साल नौकरी करके दे चुका हूं… अब ये टीईटी तो बस व्यवस्था को खुश करने के लिए है!”

क्योंकि इस देश में कभी-कभी अनुभव को प्रमाणित करने के लिए भी प्रमाणपत्र चाहिए… और प्रमाणपत्र को प्रमाणित करने के लिए फिर एक परीक्षा!

 

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