शिक्षक सत्येंद्र भंडारी ने पारंपरिक पहाड़ी संस्कृति को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ा, बुजुर्गों के साथ बच्चों ने भी सीखी दोने-पत्तल बनाने की कला
रुद्रप्रयाग। आधुनिक दौर में शादी-विवाह और अन्य मांगलिक आयोजनों में प्लास्टिक व डिस्पोजेबल सामग्री का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे समय में रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि विकासखंड के भटवाड़ी गांव निवासी शिक्षक सत्येंद्र भंडारी ने अपनी बेटी की शादी को पर्यावरण संरक्षण और पहाड़ी संस्कृति के संरक्षण का माध्यम बनाया है।
बेटी के विवाह समारोह में प्लास्टिक अथवा बाजार में मिलने वाले डिस्पोजेबल बर्तनों के बजाय मालू के पत्तों से तैयार पारंपरिक दोने-पत्तल में मेहमानों को भोजन परोसने की पहल की गई। इसके लिए ग्रामीणों ने जंगलों से मालू के पत्ते एकत्र किए और गांव में सामूहिक रूप से बैठकर पारंपरिक तरीके से दोने-पत्तल तथा पुड़खे तैयार किए।
इस पहल की खास बात यह रही कि इसमें गांव के बुजुर्गों के साथ नई पीढ़ी के बच्चों ने भी भाग लिया। बुजुर्गों ने बच्चों को मालू के पत्तों का चयन करने, उन्हें आकार देने और पारंपरिक तरीके से सिलकर दोने-पत्तल तैयार करने की कला सिखाई। इससे वर्षों पुरानी लोक परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास भी हुआ।
प्लास्टिक का प्राकृतिक विकल्प
ग्रामीणों का कहना है कि पहले पहाड़ों में शादी-ब्याह, धार्मिक अनुष्ठानों और अन्य शुभ अवसरों पर मालू, तिमला जैसे पेड़ों के पत्तों से तैयार पत्तल और दोने इस्तेमाल किए जाते थे। समय के साथ बाजार में उपलब्ध प्लास्टिक और डिस्पोजेबल सामग्री ने इन पारंपरिक विकल्पों का स्थान ले लिया।
मालू के पत्तों से तैयार दोने-पत्तल प्राकृतिक होने के कारण आयोजन के बाद आसानी से नष्ट हो जाते हैं। इससे प्लास्टिक कचरे की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है। मालू के पत्तों को पारंपरिक रूप से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मांगलिक एवं धार्मिक आयोजनों से भी जोड़ा जाता रहा है।
परंपरा के साथ रोजगार की संभावना
सत्येंद्र भंडारी और ग्रामीणों की यह पहल केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है। मालू के पत्तों से दोने-पत्तल तैयार करने की परंपरा को व्यवस्थित रूप से बढ़ावा दिया जाए तो इससे ग्रामीण क्षेत्रों में महिला समूहों और स्थानीय लोगों के लिए स्वरोजगार के अवसर भी विकसित हो सकते हैं।
रुद्रप्रयाग में इससे पहले भी मालू के पत्तों से पर्यावरण-अनुकूल डिस्पोजेबल सामग्री तैयार करने की दिशा में प्रयास हो चुके हैं। स्थानीय स्तर पर इसकी मांग बढ़ने पर ग्रामीणों की आर्थिकी को इससे जोड़ा जा सकता है।
एक शादी से निकला बड़ा संदेश
सत्येंद्र भंडारी के परिवार की यह पहल इस मायने में खास है कि इसमें एक पारिवारिक समारोह को सामाजिक सरोकार से जोड़ा गया। शादी में आने वाले लोगों को पारंपरिक दोने-पत्तल में भोजन परोसकर यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि पर्यावरण संरक्षण के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती, बल्कि अपनी पुरानी और प्रकृति-अनुकूल परंपराओं को दोबारा अपनाना भी एक प्रभावी कदम हो सकता है।
गांव में इस पहल के दौरान रघुवीर सिंह चौहान, भीम सिंह जगवाण, मानवेंद्र सिंह नेगी, पूर्ण सिंह चौहान, विक्रम सिंह रौतेला, भरत सिंह जगवाण, योगम्बर सिंह मिंगवाल, दिगंबर सिंह मिंगवाल, आनंद सिंह रौथाण, विक्रम सिंह भंडारी, अमीषा बिष्ट, सुनील भंडारी, वैशाख सिंह, अनीता देवी भंडारी, रामेश्वरी देवी, उर्मिला देवी, मथुरा देवी, राजेश्वरी देवी और अजय आनंद नेगी सहित अन्य ग्रामीणों की सहभागिता रही।