सुप्रीम कोर्ट के आदेश से शिक्षकों के भविष्य पर मंडराया संकट, प्रदेश और केंद्र सरकार के स्तर पर समाधान का दिया आश्वासन
देहरादून। उत्तराखंड में 23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता समाप्त करने की मांग को लेकर विशिष्ट बीटीसी प्रदेश संघर्ष समिति उत्तराखंड के प्रतिनिधिमंडल ने रविवार को देहरादून में पूर्व राज्यमंत्री एवं भाजपा प्रदेश प्रवक्ता रविंद्र जुगरान से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने उन्हें शिक्षकों से जुड़े इस ज्वलंत मुद्दे से अवगत कराते हुए पूर्व नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से राहत दिलाने के लिए प्रदेश और केंद्र सरकार के स्तर पर प्रभावी पहल करने का अनुरोध किया।

प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि लंबे समय से शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे शिक्षकों के सामने टीईटी की अनिवार्यता के कारण भविष्य को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न हो गई है। इस निर्णय से न केवल शिक्षकों की सेवा और पदोन्नति प्रभावित होने की आशंका है, बल्कि उनके परिवारों का भविष्य भी अनिश्चितता के दायरे में आ गया है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से शिक्षकों की बढ़ी चिंता
समिति के प्रतिनिधियों ने रविंद्र जुगरान को अवगत कराया कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा 1 सितंबर 2025 को पारित आदेश के क्रम में शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित प्रावधानों के अनुसार शिक्षकों के लिए टीईटी उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता का विषय सामने आया है। प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, इस आदेश के चलते 23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को भी टीईटी उत्तीर्ण करने की आवश्यकता का सामना करना पड़ रहा है।
प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि आदेश में 55 वर्ष से अधिक आयु के शिक्षकों को कुछ शर्तों के साथ सेवा में बने रहने की छूट दी गई है, लेकिन टीईटी उत्तीर्ण नहीं करने की स्थिति में उन्हें पदोन्नति का लाभ नहीं मिलने की बात कही गई है। साथ ही, समिति के अनुसार, निर्धारित समयसीमा तक टीईटी उत्तीर्ण नहीं कर पाने वाले शिक्षकों की सेवा पर भी संकट उत्पन्न हो सकता है।
समिति ने इस स्थिति को शिक्षकों के लिए अत्यंत चिंताजनक बताते हुए कहा कि लंबे समय तक शिक्षा व्यवस्था में योगदान देने वाले शिक्षकों के सामने अब अपनी नौकरी और भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है।
25 लाख शिक्षकों के भविष्य का सवाल
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि इस निर्णय से उत्तराखंड सहित देशभर के लगभग 25 लाख शिक्षकों का भविष्य प्रभावित होने की आशंका है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे शिक्षकों की है, जिन्होंने दो से तीन दशक तक विद्यालयों में सेवाएं दी हैं और सरकार द्वारा निर्धारित तत्कालीन नियमों एवं योग्यता मानकों के अनुसार शिक्षक पद पर नियुक्ति प्राप्त की थी।
समिति का तर्क है कि जब इन शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी, तब लागू नियमों के अंतर्गत निर्धारित योग्यताओं को पूरा करने के बाद ही उन्हें सेवा में लिया गया था। ऐसे में 25 से 30 वर्ष तक अध्यापन कार्य करने के बाद उनके लिए टीईटी उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता लागू करना व्यावहारिक कठिनाइयां उत्पन्न कर सकता है।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि शिक्षकों ने अपने सेवाकाल में विद्यार्थियों के शैक्षिक विकास और सरकारी विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसलिए उनके पूर्व में अर्जित सेवा अनुभव, नियुक्ति के समय लागू नियमों और वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस समस्या का समाधान किया जाना चाहिए।
RTE और NCTE के प्रावधानों का दिया हवाला
समिति के प्रतिनिधियों ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) तथा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ था, जबकि एनसीटीई ने 23 अगस्त 2010 को शिक्षक पात्रता संबंधी प्रावधानों को अधिसूचित किया था।
प्रतिनिधिमंडल का कहना था कि 23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों ने अपनी नियुक्ति के समय लागू नियमों और सरकार द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार सेवा प्राप्त की थी। ऐसे में इन शिक्षकों की नियुक्ति के समय लागू व्यवस्था तथा लंबे सेवाकाल को ध्यान में रखते हुए उन्हें टीईटी की अनिवार्यता से छूट प्रदान करने पर विचार किया जाना चाहिए।
समिति ने इस मुद्दे को केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षकों की सेवा सुरक्षा, पदोन्नति और भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया। प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि पूर्व नियुक्त शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए उचित नीतिगत एवं कानूनी समाधान निकाला जाए।
रविंद्र जुगरान ने गंभीरता से सुनी मांग
पूर्व राज्यमंत्री एवं भाजपा प्रदेश प्रवक्ता रविंद्र जुगरान ने प्रतिनिधिमंडल की बातों को गंभीरता से सुना। समिति के अनुसार, उन्होंने पूर्व नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से राहत देने की मांग को जायज मानते हुए इस समस्या के समाधान के लिए प्रदेश और केंद्र सरकार के स्तर पर प्रयास करने का आश्वासन दिया।
उन्होंने इस विषय पर राज्य के शिक्षा सचिव तथा केंद्रीय शिक्षा मंत्री से मुलाकात कर शिक्षकों की समस्या को उनके समक्ष रखने और समाधान की दिशा में पहल करने का भरोसा दिलाया।
प्रतिनिधिमंडल ने उम्मीद जताई कि सरकार इस विषय की गंभीरता को समझते हुए पूर्व नियुक्त शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए सकारात्मक निर्णय लेगी। समिति का कहना है कि शिक्षकों को राहत प्रदान करने के लिए ऐसा समाधान आवश्यक है, जिससे लंबे समय से सेवाएं दे रहे शिक्षकों की आजीविका और भविष्य सुरक्षित रह सके।
ब्रिज कोर्स से राहत दिलाने के लिए जताया आभार
विशिष्ट बीटीसी प्रदेश संघर्ष समिति उत्तराखंड ने इस अवसर पर रविंद्र जुगरान के पूर्व में किए गए प्रयासों को भी याद किया। समिति ने बताया कि उनके प्रयासों से पूर्व में लगभग 16,500 शिक्षकों को ब्रिज कोर्स के मामले में राहत मिली थी।
प्रतिनिधिमंडल ने इसके लिए उनका हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए उम्मीद जताई कि वे टीईटी की अनिवार्यता से जुड़े वर्तमान मुद्दे पर भी प्रभावी पहल करेंगे, ताकि प्रभावित शिक्षकों को राहत मिल सके।
प्रतिनिधिमंडल में ये रहे शामिल
इस अवसर पर विशिष्ट बीटीसी प्रदेश संघर्ष समिति उत्तराखंड के प्रतिनिधिमंडल में नरेंद्र मैठाणी, राकेश बागड़ी, गोपाल भट्टाचार्य, दर्शन सिंह पंवार, अनिल चमोली, सूर्य प्रकाश पैन्यूली, कुंवर भंडारी, सुनील नेगी, विनोद रौथाण, मधुसूदन गैरोला, प्रमोद उनियाल, विजेंद्र, प्रदीप बाजपेई, संत कुमार, विपिन सचान, राजेश रौथाण, मनोज नौटियाल, अरविंद मीडा और जय प्रकाश पाण्डेय सहित अन्य प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि पूर्व नियुक्त शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा और इस विषय को संबंधित सरकारी स्तरों पर उठाया जाता रहेगा। समिति को उम्मीद है कि सरकार शिक्षकों की समस्याओं पर गंभीरता से विचार कर ऐसा समाधान निकालेगी, जिससे उनके अनुभव, सेवाकाल और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।