एसआईआर से जनगणना तक गैर-शैक्षणिक कार्यों में उलझे शिक्षक, अब एफएलएन प्रशिक्षण की तैयारी, लगातार ड्यूटी के बीच पढ़ाई का नुकसान पूरा करना चुनौती

जनगणना, चुनावी ड्यूटी और प्रशिक्षण के बीच पिस रही प्राथमिक शिक्षा, बच्चों की पढ़ाई पर संकट

शिक्षा का अधिकार डेस्क।  उत्तराखंड में प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था इन दिनों एक गंभीर चुनौती से गुजर रही है। एक ओर सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों की बुनियादी शिक्षा मजबूत करने के लिए फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेरेसी (एफएलएन) प्रशिक्षण की तैयारी चल रही है, वहीं दूसरी ओर शिक्षक लगातार विभागीय कार्यों, मतदाता सूची पुनरीक्षण, जनगणना प्रशिक्षण और आगामी चुनावी जिम्मेदारियों में उलझे हुए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब शिक्षक ही लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चों की पढ़ाई की भरपाई कैसे होगी?

जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट), रुड़की में नवंबर से प्राथमिक शिक्षकों के लिए एफएलएन समेत अन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू होने की तैयारी है। इसके तहत जनपद हरिद्वार के विभिन्न विकासखंडों के शिक्षकों को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रशिक्षण का उद्देश्य कक्षा एक से तीन तक के बच्चों में पढ़ने, लिखने, भाषा समझने और गणित की बुनियादी दक्षताओं को विकसित करना है। उद्देश्य महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके आयोजन के समय को लेकर शिक्षा व्यवस्था की जमीनी परिस्थितियों पर भी विचार किए जाने की जरूरत है।

एसआईआर से जनगणना तक, लगातार ड्यूटी में उलझे शिक्षक

शैक्षिक सत्र 2026-27 की शुरुआत से ही शिक्षकों पर विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियों का दबाव बना हुआ है। पहले विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के कार्य में शिक्षकों की भागीदारी रही। इसके बाद जनगणना के प्रथम चरण से संबंधित प्रशिक्षण और कार्यों में शिक्षकों को लगाया गया। अब जनगणना के अगले चरण की तैयारियों के बीच जनपद के विभिन्न विकासखंडों में प्रशिक्षण कार्यक्रम चल रहे हैं, जो नवंबर के मध्य तक जारी रहने की संभावना है।

इसी बीच प्राथमिक शिक्षकों के लिए एफएलएन प्रशिक्षण की तैयारी भी सामने आ गई है। परिणामस्वरूप शिक्षकों के सामने एक साथ कई जिम्मेदारियां निभाने की चुनौती खड़ी हो गई है। एक तरफ विद्यालय में नियमित शिक्षण कार्य की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ विभागीय प्रशिक्षण, सर्वेक्षण और प्रशासनिक कार्यों में समय देना पड़ रहा है।

एक दिसंबर से पांच जनवरी तक जनगणना का कार्य, फिर चुनावी जिम्मेदारियों की आशंका

उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों और जनगणना के कार्यक्रम के बीच शिक्षकों की व्यस्तता और बढ़ने की आशंका है। उपलब्ध कार्यक्रम के अनुसार, जनगणना का कार्य एक दिसंबर से पांच जनवरी तक प्रस्तावित बताया जा रहा है। हालांकि, इसकी आधिकारिक समय-सारिणी और चुनावी कार्यक्रम के साथ समन्वय की पुष्टि संबंधित विभागों से किया जाना आवश्यक है।

जनगणना का कार्य पूरा होने के बाद विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने की स्थिति में चुनाव संबंधी जिम्मेदारियां भी बढ़ सकती हैं। चुनाव के दौरान मतदान केंद्रों पर ड्यूटी, प्रशिक्षण और अन्य प्रशासनिक कार्यों में बड़ी संख्या में शिक्षकों की तैनाती की जाती है। ऐसे में आने वाले समय में विद्यालयों में नियमित शिक्षण कार्य प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

लगातार प्रशिक्षण, पढ़ाई की भरपाई कैसे होगी?

शैक्षिक सत्र के दौरान त्योहारों की छुट्टियों के कारण पहले ही शिक्षण दिवस सीमित रहते हैं। ऐसे में यदि शिक्षकों का समय लगातार प्रशिक्षण, जनगणना और अन्य प्रशासनिक कार्यों में खर्च होता है, तो बच्चों की पढ़ाई पर इसका सीधा असर पड़ना स्वाभाविक है।

प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों के लिए नियमित अभ्यास, शिक्षक का व्यक्तिगत मार्गदर्शन और कक्षा में निरंतर सहभागिता बेहद जरूरी है। कक्षा एक से तीन तक की अवधि बच्चों की शैक्षिक नींव तैयार करने का महत्वपूर्ण चरण होती है। इस दौरान पढ़ने, लिखने और सामान्य गणितीय गणनाओं में दक्षता विकसित नहीं हो पाती, तो आगे की कक्षाओं में भी बच्चों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

ऐसे में सवाल यह है कि जब शिक्षकों को बार-बार विद्यालय से बाहर प्रशिक्षण और अन्य कार्यों के लिए जाना पड़ रहा है, तो बच्चों की बुनियादी दक्षताओं के निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने की जिम्मेदारी किस तरह पूरी होगी?

प्राथमिक शिक्षा बनी प्रयोगशाला, शिक्षकों पर सूचनाओं का बोझ

शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लोगों के बीच यह चिंता भी लगातार उठती रही है कि प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों का काफी समय शिक्षण के बजाय विभागीय सूचनाएं उपलब्ध कराने, विभिन्न पोर्टल पर आंकड़े भरने, रिपोर्ट तैयार करने और प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी करने में खर्च होता है।

शिक्षक का मूल दायित्व बच्चों को पढ़ाना, उनकी सीखने की कठिनाइयों को समझना और उनके शैक्षिक स्तर में सुधार करना है। लेकिन जब शिक्षकों को लगातार नए निर्देशों, नई व्यवस्थाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों के बीच काम करना पड़ता है, तो कक्षा शिक्षण के लिए उपलब्ध समय प्रभावित होता है।

एक ओर शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए नए कार्यक्रम शुरू किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हीं कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करने वाले शिक्षकों को पर्याप्त शिक्षण समय नहीं मिल पाता। यह विरोधाभास प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।

तनाव में शिक्षक, लेकिन उनकी व्यथा सुनने वाला कौन?

लगातार बदलती जिम्मेदारियों, समयबद्ध लक्ष्यों और विभागीय अपेक्षाओं के बीच शिक्षक मानसिक दबाव का सामना कर रहे हैं। विद्यालय में बच्चों की पढ़ाई सुनिश्चित करना, अभिभावकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना, शैक्षिक अभिलेख तैयार करना और साथ ही प्रशासनिक ड्यूटी पूरी करना आसान नहीं है।

शिक्षकों की इस व्यस्तता का प्रभाव केवल उनके कार्यभार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर विद्यालय के शैक्षिक वातावरण और बच्चों की सीखने की प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है। ऐसे में आवश्यक है कि शिक्षकों की समस्याओं को केवल कार्य निष्पादन के नजरिये से न देखकर शिक्षा की गुणवत्ता से जोड़कर भी समझा जाए।

प्रशिक्षण जरूरी, लेकिन समय और व्यवस्था पर पुनर्विचार भी आवश्यक

एफएलएन प्रशिक्षण का उद्देश्य प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों की बुनियादी दक्षताओं को मजबूत करना है। इसमें कोई दोराय नहीं कि शिक्षकों को नई शिक्षण तकनीकों, गतिविधि आधारित शिक्षण और बच्चों की शैक्षिक प्रगति के आकलन की जानकारी मिलनी चाहिए। लेकिन प्रशिक्षण तभी प्रभावी होगा, जब शिक्षक सीखी गई तकनीकों को विद्यालय में पर्याप्त समय देकर लागू भी कर सकें।

इसके लिए जरूरी है कि प्रशिक्षण कार्यक्रमों का निर्धारण जनगणना, चुनावी कार्यों और अन्य अनिवार्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर किया जाए। जहां संभव हो, प्रशिक्षण की समय-सारिणी में समन्वय स्थापित किया जाए और अनावश्यक गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ कम किया जाए। साथ ही, विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और बच्चों की पढ़ाई के नुकसान की भरपाई के लिए ठोस कार्ययोजना बनाई जानी चाहिए।

असली सवाल: शिक्षक पढ़ाएंगे कब?

सरकारी प्राथमिक शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए केवल प्रशिक्षण, नए दिशा-निर्देश और लक्ष्य निर्धारित करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए शिक्षकों को कक्षा में बच्चों के साथ समय बिताने का अवसर देना भी उतना ही जरूरी है।

यदि शैक्षिक सत्र का बड़ा हिस्सा विभिन्न ड्यूटियों और प्रशासनिक कार्यों में निकल जाता है, तो बच्चों की पढ़ाई पर पड़ने वाले असर की जिम्मेदारी का आकलन भी होना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था की सफलता इस बात से तय नहीं होगी कि कितने प्रशिक्षण आयोजित हुए या कितनी सूचनाएं पोर्टल पर अपलोड की गईं, बल्कि इससे तय होगी कि बच्चे वास्तव में कितना सीख पाए।

अब जरूरत इस बात की है कि शिक्षा विभाग शिक्षकों के कार्यभार और बच्चों के शिक्षण समय के बीच संतुलन बनाए। एफएलएन जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की सफलता के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षण के साथ-साथ कक्षा में पढ़ाने का पर्याप्त समय देना भी उतना ही आवश्यक है। आखिरकार, प्राथमिक शिक्षा की नींव मजबूत करने के लिए सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षक विद्यालय में बच्चों को पढ़ाने के लिए उपलब्ध रहें।

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