मंगलौर लाइव : शिक्षकों के प्रयासों ने बदली स्कूलों की तस्वीर, नवाचारी प्रयासों से बेहतर अधिगम कर रहे बच्चे

मेहनत एवं समर्पण से बच्चों का भविष्य संवार रहे शिक्षक, प्राथमिक और जूनियर के बच्चों ने मिलकर तैयार किया अनूठा समाचार पत्र

मंगलौर ( डॉ. शिवा अग्रवाल )। बेहतर शिक्षा के लिए बड़े भवन, अत्याधुनिक सुविधाएं और भरपूर संसाधन होना जरूरी माना जाता है, लेकिन यदि शिक्षकों में कुछ नया करने का जुनून हो तो सीमित संसाधनों में भी शिक्षा की तस्वीर बदली जा सकती है। मंगलौर के कुछ राजकीय विद्यालय इस बात की मिसाल पेश कर रहे हैं। यहां संसाधनों की कमी है, विद्यालयों के पास उपलब्ध स्थान भी पर्याप्त नहीं है, लेकिन शिक्षकों के प्रयासों और नवाचारी शिक्षण गतिविधियों ने बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को नई दिशा दी है।

जी हां, बात हो रही है मंगलौर के उन राजकीय विद्यालयों की, जहां एक ही परिसर में चार विद्यालय संचालित हो रहे हैं। इनमें दो प्राथमिक विद्यालय, एक उच्च प्राथमिक विद्यालय और एक इंटर कॉलेज शामिल हैं। परिसर में कुल मिलाकर एक दर्जन से भी कम कमरे हैं, जबकि इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 600 से अधिक है। ऐसे में उपलब्ध स्थान और संसाधनों के बीच शैक्षिक गतिविधियों का संचालन करना अपने आप में एक चुनौती है।

इसके बावजूद यहां के शिक्षक चुनौतियों को बच्चों की पढ़ाई में बाधा नहीं बनने दे रहे हैं। वे परंपरागत शिक्षण पद्धति से आगे बढ़कर बच्चों को गतिविधियों, रचनात्मक कार्यों और आपसी सहभागिता के माध्यम से सिखाने का प्रयास कर रहे हैं।

सीमित संसाधनों में शिक्षा को रोचक बनाने की पहल

राजकीय प्राथमिक विद्यालय नंबर-11 मंगलौर और राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय संख्या-03 मंगलौर में शिक्षकों के प्रयास विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। यहां बच्चों को केवल पुस्तकों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें विभिन्न गतिविधियों में शामिल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य बच्चों में विषयों की समझ विकसित करने के साथ-साथ उनकी रचनात्मकता, अभिव्यक्ति क्षमता और आत्मविश्वास को बढ़ाना है।

शिक्षकों का प्रयास है कि बच्चे पढ़ाई को बोझ न समझें, बल्कि सीखने की प्रक्रिया में रुचि लें। जब बच्चे स्वयं किसी गतिविधि में भाग लेते हैं, अपनी बात रखते हैं और दूसरे बच्चों के साथ मिलकर काम करते हैं, तो उनके लिए विषयों को समझना आसान हो जाता है। यही वजह है कि इन विद्यालयों में सीखने-सिखाने के नए तरीके अपनाए जा रहे हैं।

बच्चों ने मिलकर तैयार किया समाचार पत्र, रचनात्मकता को मिले पंख

इन विद्यालयों की सबसे खास और अनूठी पहल प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चों द्वारा मिलकर समाचार पत्र तैयार करना है। यह गतिविधि बच्चों को किताबी ज्ञान से आगे बढ़कर वास्तविक जीवन से जुड़ने का अवसर देती है।

समाचार पत्र निर्माण के दौरान बच्चों को अपनी रुचि के अनुसार विषयों पर विचार करने, सामग्री तैयार करने, उसे व्यवस्थित करने और दूसरों के सामने प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। इस तरह की गतिविधियां बच्चों में भाषा कौशल, लेखन क्षमता, विचारों को अभिव्यक्त करने और समूह में काम करने की भावना विकसित करने में सहायक होती हैं।

प्राथमिक और जूनियर स्तर के बच्चों का मिलकर इस तरह का प्रयास करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे छोटे बच्चों को बड़े बच्चों से सीखने का अवसर मिलता है। वहीं, बड़े बच्चों में सहयोग, जिम्मेदारी और नेतृत्व की भावना विकसित होती है।

विद्यालयों में इस तरह की गतिविधियां यह संदेश देती हैं कि यदि बच्चों को उचित अवसर और शिक्षकों का मार्गदर्शन मिले, तो वे सीमित संसाधनों में भी अपनी प्रतिभा का बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।

खेल-खेल में सीखने पर जोर

राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय संख्या-03 मंगलौर के प्रधानाध्यापक वसीम बच्चों को खेल-खेल में सिखाने की पद्धति पर जोर देते हैं। उनका मानना है कि बच्चों के लिए सीखने की प्रक्रिया जितनी सहज, रोचक और सहभागितापूर्ण होगी, वे उतनी ही रुचि के साथ उसमें शामिल होंगे।

प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक फरमान अली कहते हैं कि खेल आधारित गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को विषयों को समझने, सवाल पूछने और अपनी जिज्ञासाओं का समाधान खोजने का अवसर मिलता है। वह कहते हैं कि नवाचारी शिक्षिका अमरीन, वंदना शर्मा आदि के सहयोग से कक्षा में बच्चों की सक्रिय भागीदारी बढ़ती है और वे सीखी गई बातों को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं।

शिक्षण में खेल और गतिविधियों का समावेश बच्चों के लिए सीखने के अनुभव को आनंददायक बनाता है। विशेषकर प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर यह पद्धति बच्चों की स्वाभाविक जिज्ञासा को बनाए रखने और उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विद्यालय में बच्चों को सक्रिय रूप से सीखने के अवसर देने का प्रयास किया जा रहा है। सीमित संसाधनों के बावजूद इस तरह की पहल शिक्षा को बच्चों के अधिक करीब लाने का काम कर रही है। विद्यालय एक टीम की तरह कार्य करता है जिसमें वंदना शर्मा, शकील अहमद, शाद रानी, मोतीराम, इशरत जहां आदि का उल्लेखनीय योगदान है।

नवाचारी शिक्षण में शिक्षिका अमरीन नाज की महत्वपूर्ण भूमिका

राजकीय प्राथमिक विद्यालय नंबर-11 मंगलौर की नवाचारी शिक्षिका अमरीन नाज भी बच्चों को नियमित रूप से विभिन्न गतिविधियां कराती हैं। उनका प्रयास है कि बच्चे कक्षा में केवल सुनने और लिखने तक सीमित न रहें, बल्कि स्वयं गतिविधियों में भाग लेकर सीखें।

नियमित गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को अपनी प्रतिभा दिखाने, नए विचार प्रस्तुत करने और अपनी क्षमताओं को पहचानने का अवसर मिलता है। इससे उनकी सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और रुचिकर बन सकती है।

बच्चों के साथ गतिविधि आधारित शिक्षण का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इससे शिक्षक को उनकी रुचि, समझ और सीखने की गति को पहचानने में मदद मिलती है। इसके आधार पर बच्चों को आगे बढ़ने के लिए बेहतर मार्गदर्शन दिया जा सकता है।

अमरीन नाज के नवाचारी प्रयास इस बात को रेखांकित करते हैं कि शिक्षक यदि अपनी भूमिका को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित न रखें, तो विद्यालय में सीखने का बेहतर वातावरण विकसित किया जा सकता है।

शिक्षकों के सामने बड़ी चुनौती

एक ही परिसर में चार विद्यालयों का संचालन, कमरों की सीमित उपलब्धता और 600 से अधिक बच्चों की मौजूदगी अपने आप में कई चुनौतियां प्रस्तुत करती है। ऐसी परिस्थितियों में विद्यालयों के लिए पर्याप्त स्थान, बेहतर शैक्षिक वातावरण और गतिविधियों के संचालन की व्यवस्था करना आसान नहीं होता।

इसके बावजूद शिक्षकों द्वारा बच्चों के लिए नए अवसर तैयार करना सराहनीय है। हालांकि, शिक्षकों के व्यक्तिगत प्रयासों के साथ-साथ विद्यालयों में आधारभूत सुविधाओं का बेहतर होना भी जरूरी है। पर्याप्त कक्ष, शिक्षण सामग्री और गतिविधियों के लिए अनुकूल स्थान मिलने से इन प्रयासों को और प्रभावी बनाया जा सकता है।

ऐसे विद्यालयों की जरूरतों को समझते हुए संबंधित विभाग और प्रशासन यदि आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाएं, तो शिक्षकों की मेहनत को और बेहतर परिणामों में बदला जा सकता है।

शिक्षकों की पहल बनी बच्चों के बेहतर अधिगम का आधार

मंगलौर के इन विद्यालयों की कहानी केवल सीमित संसाधनों के बीच पढ़ाई जारी रखने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सोच को भी सामने लाती है, जिसमें शिक्षक बच्चों की जरूरतों को समझते हुए शिक्षण के नए तरीके अपनाते हैं।

बच्चों द्वारा समाचार पत्र तैयार करना, विभिन्न गतिविधियों में भाग लेना और खेल-खेल में सीखना ऐसे प्रयास हैं, जो शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, रोचक और सहभागितापूर्ण बनाने में मदद करते हैं।

इन विद्यालयों के शिक्षकों ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए संसाधनों के साथ-साथ शिक्षक की प्रतिबद्धता, रचनात्मक सोच और बच्चों के प्रति संवेदनशीलता भी महत्वपूर्ण है।

मंगलौर के ये विद्यालय एक सकारात्मक संदेश दे रहे हैं—संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन यदि शिक्षकों के प्रयास निरंतर हों और बच्चों को सीखने के पर्याप्त अवसर मिलें, तो विद्यालयों में बदलाव की मजबूत नींव रखी जा सकती है।

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