बड़ी खबर : उत्तर प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखंड में शिक्षकों के लिए अलग से टीईटी की तैयारी, शिक्षा मंत्री ने अधिकारियों को प्रस्ताव बनाने के दिए निर्देश

करीब 15 हजार शिक्षकों को मिल सकती है राहत, यूपी में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्राथमिक स्तर के 64,062 और उच्च प्राथमिक स्तर के 62,565 शिक्षकों के लिए कराई जा रही विशेष अध्यापक पात्रता परीक्षा

देहरादून। उत्तर प्रदेश में शिक्षकों के लिए विशेष अध्यापक पात्रता परीक्षा (टीईटी) कराए जाने की तर्ज पर अब उत्तराखंड में भी वर्षों से कार्यरत शिक्षकों के लिए अलग से टीईटी कराने की तैयारी शुरू हो गई है। प्रदेश में करीब 15 हजार शिक्षकों को इसका लाभ मिल सकता है। शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने इस मामले में अधिकारियों को विस्तृत अध्ययन कर प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए हैं। विभागीय स्तर पर प्रस्ताव तैयार होने के बाद इसे शासन के समक्ष रखा जाएगा और शासनादेश जारी होने के पश्चात शिक्षकों के लिए अलग से टीईटी आयोजित कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।जानकारी के अनुसार, इस संबंध में राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रांतीय तदर्थ समिति के सदस्य दिगंबर सिंह नेगी के नेतृत्व में शिक्षकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने शिक्षकों की लंबे समय से चली आ रही समस्या को शिक्षा मंत्री के सामने रखा। इस दौरान रामनगर बोर्ड के सचिव विनोद ढौंडियाल और प्रारंभिक शिक्षा निदेशक कुंवर सिंह रावत को भी यूपी की तर्ज पर उत्तराखंड में शिक्षकों के लिए विशेष व्यवस्था का प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजने के निर्देश दिए गए।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बढ़ी टीईटी की अनिवार्यता

शिक्षकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर कार्यरत शिक्षकों के लिए विशेष अध्यापक पात्रता परीक्षा आयोजित कराने की प्रक्रिया शुरू की गई है। यूपी सरकार की ओर से जारी आदेश में प्राथमिक स्तर के 64,062 और उच्च प्राथमिक स्तर के 62,565 शिक्षकों को विशेष अध्यापक पात्रता परीक्षा का अवसर दिए जाने की बात कही गई है।उत्तराखंड में भी इसी तरह की स्थिति का सामना कर रहे शिक्षकों की संख्या काफी अधिक है। प्रदेश के कई शिक्षक ऐसे हैं, जो लंबे समय से सरकारी विद्यालयों में सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन नियुक्ति के समय या बाद में लागू हुई व्यवस्था के कारण उनके सामने टीईटी की अनिवार्यता का प्रश्न खड़ा हो गया है। शिक्षकों का तर्क है कि उन्होंने वर्षों तक विभाग में अपनी सेवाएं दी हैं और अब सेवा के अंतिम वर्षों में उनके लिए टीईटी पास करना व्यावहारिक रूप से बड़ी चुनौती बन सकता है।

53-54 साल की उम्र में परीक्षा देने की चुनौती

शिक्षकों की सबसे बड़ी चिंता उनकी उम्र को लेकर है। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि प्रदेश में बड़ी संख्या में शिक्षक अब 53 से 54 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं। ऐसे में उनसे अब टीईटी उत्तीर्ण करने की अपेक्षा करना आसान नहीं है। शिक्षकों के अनुसार, यदि उन्हें टीईटी से राहत नहीं दी गई तो इसका सीधा असर उनकी पदोन्नति पर पड़ सकता है और कुछ मामलों में उनकी नौकरी को लेकर भी परेशानी उत्पन्न हो सकती है।

शिक्षकों का कहना है कि जिन परिस्थितियों में उनकी नियुक्तियां हुई थीं, उस समय जो सेवा शर्तें लागू थीं, उन्होंने उसी के अनुरूप अपनी सेवाएं दीं। अब लंबे समय तक नौकरी करने के बाद नई पात्रता शर्त लागू होने से उनके सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। उनका कहना है कि यदि सरकार यूपी की तर्ज पर उत्तराखंड में भी विशेष टीईटी आयोजित कराती है तो ऐसे हजारों शिक्षकों को बड़ी राहत मिल सकती है।

2010 की अधिसूचना के बाद अनिवार्य हुआ टीईटी

शिक्षकों के अनुसार, एनसीटीई ने 23 अगस्त 2010 को अधिसूचना जारी करते हुए कक्षा एक से आठवीं तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए टीईटी को अनिवार्य किया था। इसके बाद शिक्षकों की नियुक्तियों में टीईटी की शर्त लागू होती चली गई। हालांकि, इससे पहले नियुक्त हुए कई शिक्षक ऐसे हैं, जिन्होंने वर्षों तक विभाग में सेवा की है और अब उनकी उम्र सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच रही है।

इन शिक्षकों का कहना है कि जब उनकी नियुक्ति हुई थी, उस समय जो सेवा शर्तें निर्धारित थीं, उन्होंने उन्हें पूरा किया और उसी आधार पर उनकी नियुक्ति हुई। अब सेवा के लंबे अंतराल के बाद टीईटी की अनिवार्यता का प्रभाव उनके सेवाकाल और पदोन्नति पर पड़ना उनके लिए चिंता का विषय है।

शिक्षा मंत्री ने अधिकारियों को प्रस्ताव तैयार करने के दिए निर्देश

शिक्षकों की मांग पर शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने अधिकारियों को मामले का अध्ययन कर ठोस प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए हैं। मंत्री ने अधिकारियों से कहा है कि यूपी में इस संबंध में जारी आदेश और वहां अपनाई जा रही प्रक्रिया का अध्ययन किया जाए तथा उत्तराखंड की परिस्थितियों के अनुरूप प्रस्ताव तैयार किया जाए।

अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा जाए, ताकि इस मामले में आगे की कार्रवाई की जा सके। मंत्री की ओर से अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया है कि शिक्षकों के हित में जो संभव हो, उस पर गंभीरता से विचार किया जाए।

17 और 18 अगस्त को अधिकारियों की बैठक

शिक्षा मंत्री के निर्देश के बाद अब इस मामले में विभागीय स्तर पर तेजी आने की उम्मीद है। अधिकारियों को यूपी में जारी आदेश का अध्ययन करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके लिए 17 और 18 अगस्त को संबंधित अधिकारियों की बैठक प्रस्तावित है। बैठक में यूपी की व्यवस्था, उत्तराखंड में कार्यरत शिक्षकों की स्थिति और विशेष टीईटी आयोजित कराने की संभावनाओं पर चर्चा की जाएगी।

बैठक में तैयार होने वाले प्रस्ताव के आधार पर आगे शासन स्तर पर निर्णय लिया जाएगा। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, यदि प्रस्ताव को शासन की मंजूरी मिलती है तो लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों के लिए अलग से टीईटी कराने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

शिक्षकों को उम्मीद, सरकार देगी सेवा सुरक्षा

शिक्षकों का कहना है कि उनका उद्देश्य टीईटी की व्यवस्था का विरोध करना नहीं है, बल्कि वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के लिए व्यावहारिक और न्यायसंगत रास्ता निकालना है। उनका कहना है कि जो शिक्षक लंबे समय से विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं और अपनी सेवा पूरी कर चुके हैं, उनके मामले में सरकार को उम्र, पूर्व सेवा और नियुक्ति के समय लागू नियमों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

यूपी में विशेष टीईटी के लिए अपनाई गई प्रक्रिया ने उत्तराखंड के शिक्षकों को भी उम्मीद दी है। यदि उत्तराखंड सरकार यूपी की तर्ज पर विशेष टीईटी कराने का निर्णय लेती है तो इससे करीब 15 हजार शिक्षकों को राहत मिलने की संभावना है। फिलहाल गेंद शिक्षा विभाग और शासन के पाले में है। अधिकारियों की प्रस्तावित बैठक के बाद इस मामले में तस्वीर और साफ होने की उम्मीद है।

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