सड़कों पर फायरिंग और स्टंट करती पीढ़ी और हम……

डॉ. शिवा अग्रवाल 

हम भी स्कूलों/ कॉलेज/ यूनिवर्सिटी में पढ़े हैँ। विदाई पार्टी के लिये अध्यापक पैसे इकट्ठा करते थे और स्कूल में ही यह पार्टी आयोजित होती थी। अब यह पार्टी स्कूल में नहीं होती बड़े बड़े नामी होटल में होती है। 3000-5000 रुपये का कंट्रीब्यूशन, होटल में शराब, हुक्का, ड्रग्स आदि पीने के लिये कमरे बुक होते हैँ। पार्टी चलती है। पार्टी की तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती है। कोट-पैंट, साड़ी ख़रीदे जाते हैँ। फिर शुरू होता है वो खेल जिससे माँ-बाप, स्कूल सब शर्मसार होते हैँ। 03 एवं 04 जनवरी को फेयरवेल के नाम पर ऐसा कुछ हुआ जिसने बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर दिया। पहले बात 03 जनवरी की जिसमें भेल रानीपुर के नामी स्कूल के बच्चों ने सिडकुल के होटल में पार्टी आर्गेनाइज की। वैसे तो यह आयोजन या तो स्कूल में होना चाहिए था या स्कूल प्रबंधन इस आयोजन में शामिल रहता परन्तु वो लोग इस पीढ़ी की हसरतें जानते हैँ जिससे उन्होंने अपने हाथ खड़े कर लिये। पार्टी हुई, नाच गाना, फोटो शूट सब हुआ। जिन बच्चों के पेरेंट्स संजीदा रहे वह अपने बच्चों को समय से ले आए और कुछ बच्चे देर रात तक पार्टी करते रहे। उसी दिन दोपहर के वक़्त लम्बी चमकदार कारें लेकर बच्चे काफ़िला बनाकर भेल स्टेडियम पहुंचें और वहां शराब पी। फिर फायरिंग, आतिशबाजी और स्टंट का खेल। हैरान करने की बात हैं कि इन नाबालिग बच्चों जिनके पास ड्राइविंग लाइसेंस तक नहीं होगा सरेआम कार से बाहर लटककर काफ़िले में चलते रहे। अब सवाल यह उठता हैं कि जिस हथियार से फायर किये गये वह हथियार किसके थे और कहाँ से आए। यदि यह हथियार इनके घरों में तो पहली कार्यवाही उनका घरवालों पर होनी चाहिए। दूसरी कार्यवाही उन होटल संचालकों पर जो बच्चों को शराब पीने देते हैँ या और नशा उनके संरक्षण में होता है। टशन का यह खेल यंही ख़त्म नहीं होता, रानीपुर बनाम जगजीतपुर स्थित नामी स्कूल के बच्चों में आपसी प्रतिस्पर्धा कोई नयी नहीं। पहले रानीपुर तो 04 जनवरी को जगजीतपुर के बच्चों ने हम भी तुमसे कम नही की तर्ज पर कारों के काफ़िले में सवार होकर भेल में स्टंट किया। कहानी हर साल की है पर अतिरेक ये हुआ की खुद ही सोशल प्रेम में इंस्टा पर वीडियो चस्पा कर दी गयी। अब घरवाले दुखी।

अब इसका दूसरा पक्ष यह है कि आने वाली पीढ़ी की यह दशा और दिशा अत्यंत सोचनीय है। इन बच्चों को जल्द बड़ा होना है और सबकुछ एक झटके में पाना है। रही सही कसर हमारी परवरिश कर रही है जिसमें परिवार बच्चे की जिद्द को हर हालत में पूरा करना चाहते हैँ। बर्गर, पिज़्ज़ा, मोमोस से शारीरिक रूप से कमजोर, दिमागी रूप से क्रोधी इस पीढ़ी के भविष्य के प्रति मुझे गहरी चिंता होती है। इसका स्याह पक्ष हमारे समाज में हावी वो तत्व भी हैं जो सरकार के समुचित नियंत्रण के अभाव में सिनेमा, ओटीटी के जरिये अश्लीलता, भद्दी भाषा,सेक्स, नशा और न जाने क्या क्या परोसते हैँ। घर परिवार, समाज, स्कूल के प्रभाव से मुक्त बच्चे दिशाहीन होकर ये किस रास्ते पर हैँ? इस पर विचार तो हमारी व्यवस्था और बुद्धिजीवी वर्ग को करना होगा। वरना जाति, संप्रदाय की लड़ाईयों में बंटा हमारा समाज बहुत कुछ खो देगा। युवा पीढ़ी को भटकाव से बाहर लाने की जिम्मेदार आखिर किसी को तो स्वीकारनी होगी।

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