अनुभवों की विरासत: सेवानिवृत्त शिक्षकों ने साझा की शिक्षा की अनकही-अनसुनी कहानियां, प्रेरक प्रसंग भी साझा किए

हरिद्वार। “अनुभव से सीख, शिक्षा की अनकही-अनसुनी कहानियां ” विषय पर सेवानिवृत्त शिक्षकों के अनुभवों को साझा करने के उद्देश्य से अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के जिला केंद्र, कनखल में एक भावनात्मक एवं प्रेरणादायी संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न विद्यालयों से सेवानिवृत्त शिक्षक एक मंच पर एकत्र हुए और उन्होंने अपने वर्षों के शैक्षिक अनुभव, संघर्ष, उपलब्धियां और शिक्षा के बदलते स्वरूप पर अपने विचार रखे।

कार्यक्रम की शुरुआत परिचय एवं शिक्षा के महत्व और शिक्षक की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए की गई। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि समाज के निर्माण की नींव रखने वाला मार्गदर्शक होता है। संवाद के दौरान यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि समय के साथ शिक्षा के साधन और तरीके भले बदल गए हों, लेकिन शिक्षक की संवेदनशीलता, समर्पण और धैर्य आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

राकेश धस्माना ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्होंने दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करते हुए यह महसूस किया कि संसाधनों की कमी कभी भी सीखने में बाधा नहीं बनती, यदि शिक्षक और छात्र दोनों में जिज्ञासा और लगन हो।

श्रीमती रमा वैश ने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक लाना नहीं, बल्कि बच्चों में मानवीय मूल्यों का विकास करना है, जिसके लिए शिक्षक को संवेदनशील और धैर्यवान होना आवश्यक है।

हेमचंद्र जोशी ने अपने लंबे अनुभव के आधार पर बताया कि शिक्षक का आचरण ही बच्चों के व्यक्तित्व को आकार देता है, इसलिए शिक्षक को स्वयं आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए।

नवीन कुमार ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में नवाचार और गतिविधि आधारित शिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि इससे बच्चों की सहभागिता बढ़ती है।

सरवरी खातून ने बालिका शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि सामाजिक बदलाव के लिए लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।

लक्ष्मी चंद ने अनुशासन और नियमितता को अपने शिक्षण जीवन की सबसे बड़ी सीख बताते हुए कहा कि यही सफलता का मूल आधार है।

अर्चना द्विवेदी ने कहा कि प्रत्येक बच्चा अलग होता है, इसलिए शिक्षक को उसकी क्षमता और गति के अनुसार शिक्षण पद्धति अपनानी चाहिए।

सुनीता रानी शर्मा ने विद्यालय और अभिभावकों के बीच बेहतर समन्वय को बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक बताया।

मालती उपाध्याय ने अपने कार्यकाल के दौरान किए गए सामाजिक जागरूकता अभियानों का उल्लेख करते हुए बताया कि शिक्षक समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।

पूनम देवी ने कहा कि शिक्षक का सकारात्मक दृष्टिकोण बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाता है और उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

प्रदीप कुमार ने शिक्षा में तकनीक के बढ़ते उपयोग को उपयोगी बताते हुए कहा कि इसके साथ-साथ नैतिक मूल्यों को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।

पूनम सिंह ने बाल मनोविज्ञान की समझ को प्रभावी शिक्षण का आधार बताते हुए कहा कि शिक्षक को बच्चों की भावनाओं को समझना चाहिए।

मंजू कपूर ने कहा कि शिक्षण एक सेवा है, जिसे पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ निभाना चाहिए।

डॉ. मीना मदान ने निरंतर सीखते रहने की प्रवृत्ति को शिक्षक के लिए अनिवार्य बताते हुए कहा कि बदलते समय के साथ शिक्षक को भी स्वयं को अपडेट रखना चाहिए।

ताहिर हसन ने शिक्षा को सामाजिक समरसता का सबसे प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि इसके जरिए समाज में समानता और भाईचारे को बढ़ावा दिया जा सकता है।

अजय शर्मा ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि एक शिक्षक को हर परिस्थिति में सकारात्मक रहकर विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन श्रीमती नीलम कंवर ने किया। इस अवसर पर डॉ. शिवा अग्रवाल, श्रीकांत शर्मा, मोहम्मद युनुस, रवि कुमार गोस्वामी, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन से प्राची, अरुण नौटियाल, महिमा नटराजन, मोनिका, अभिमन्यु आदि उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के दौरान वातावरण अत्यंत भावुक और प्रेरणादायी बना रहा, जहां शिक्षकों ने अपने जीवन के अनेक ऐसे प्रसंग साझा किए, जो शिक्षा के मानवीय पक्ष को उजागर करते हैं। अंत में सभी प्रतिभागियों ने इस तरह के संवाद कार्यक्रमों को निरंतर आयोजित किए जाने की आवश्यकता जताई, ताकि अनुभवी शिक्षकों की सीख नई पीढ़ी तक पहुंच सके और शिक्षा व्यवस्था को और अधिक सशक्त बनाया जा सके। कार्यक्रम के अंत में केक काटकर एवं प्रतीक चिह्न भेंट सभी को विदाई दी गई।

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