कुत्तों को गिनते शिक्षक, बदहाल होती बच्चों की कक्षाएं

शिक्षा का अधिकार डेस्क। शिक्षक परंपरागत रूप से बच्चों के भविष्य का निर्माता,समाज का मार्गदर्शक और राष्ट्र के बौद्धिक स्तंभ माने जाते हैं। शिक्षा का कार्य केवल ज्ञान का संचार भर नहीं,बल्कि मानवीय मूल्यों,नागरिक चेतना,चरित्र निर्माण और सामाजिक विकास का आधार भी है।किंतु विडंबना यह है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों को अक्सर शिक्षण के अतिरिक्त असंख्य गैर-शैक्षणिक कार्यों में झोंक दिया जाता है-जनगणना कार्य,चुनाव आयोग का चुनावी प्रबंधन,स्वास्थ्य विभाग की डोर- टू-डोर गतिविधियाँ, सर्वेक्षण, खाद्यान्न वितरण का रिकॉर्ड, पंचायत गतिविधियाँ और यहां तक कि कई बार स्थानीय प्रशासन द्वारा सौंपे गए तात्कालिक काम भी उन्हें ही करने पड़ते हैं

इसी व्यापक संदर्भ में हाल ही में जम्मू- कश्मीर के पुंछ और कुपवाड़ा जिलों में शिक्षकों को स्कूल परिसर के आसपास दिखने वाले आवारा कुत्तों की पहचान ,रिपोर्टिंग, निगरानी और कुत्तों से सावधान रहें जैसे साइनबोर्ड लगाने के आदेश ने एक राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है।शिक्षकों ने इस निर्देश को घिनौना,अपमानजनक और हंसी का पात्र बनाने वाला कदम कहा है।यह मामला केवल दो जिलों तक सीमित नहीं,बल्कि यह भारत की शिक्षा प्रणाली के उस संकटपूर्ण ढांचे की ओर संकेत करता है, जिसमें शिक्षक एक मल्टी-डिपार्टमेंट वर्कर बनकर रह गया है। यह विश्लेषण इस पूरी घटना कासामाजिक,प्रशासनिक, न्यायिक, शैक्षणिक और अंतरराष्ट्रीय नजरिए से विस्तृत मूल्यांकन करता है।

जब शिक्षक कुत्तों की गिनती करने लगे इसको समझने की करें तो,पहला मुद्दा जो चर्चा में आया,वह जम्मू कश्मीर राज्य के जहां से अब भारतीय संविधान क़ा अनुच्छेद 370 हटा दिया गया है,पुंछ व कुपवाड़ा जैसे जिलों में जारी आदेश है, जिसमें शिक्षकों को आवारा कुत्तों की गिनती,उनके दिखने के स्थानों कीडॉक्यूमेंटेशन और उनके व्यवहार या घटनाओं की रिपोर्टिंग का कार्य सौंपा गया।शिक्षक संगठनों का कहना है कि यह कदम उनके पेशेवर सम्मान के खिलाफ़ है, और ऐसा लग रहा है मानो शिक्षकों को किसी भी प्रकार का प्रशासनिक बोझ वर्गीकृत कर दिया गया है।आदेशों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि प्रत्येक विद्यालय एक नोडल अधिकारी नियुक्त करे, जो आवारा कुत्तों के दृश्य की रिकॉर्डिंग करे और उसे जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में प्रस्तुत करे।यह स्थिति उन दूरस्थ स्कूलों में और भी जटिल है जहाँ शिक्षक पहले से ही बहु-स्तरीय कार्यों में बँधे हुए हैं,स्कूल चलाना ,कक्षाओं का संचालन, मिड-डे मील मॉनिटरिंग,प्रवेश प्रक्रिया,विभागीय रिपोर्टिंग, प्रशासनिक निरीक्षण,आरटीई अनुपालन,ऐसे में कुत्तों की गिनती का कार्य जोड़ना शिक्षकों के कार्यभार को गैर-जरूरी रूप से बढ़ाता है और शिक्षा-गत गुणवत्ता को कम करता है।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन का कहना है कि कई जिलों में आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ी है और कई स्कूल परिसरों में कुत्तों ने बच्चों पर हमला करने की घटनाएँ दर्ज हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में आवारा कुत्तों की जनसंख्या नियंत्रण और पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम को प्रभावी रूप से लागू करने के निर्देश दिए थे। यही कारण है कि जिला उपायुक्त ने एक महत्वपूर्ण बैठक की, जिसमें निर्णय लिया गया कि,कुत्तों की निगरानी,पशु जन्म नियंत्रण का क्रियान्वयन, नगरपालिकाओं से सहयोग खतरनाक पशुओं पर नजर,छात्रों की सुरक्षा,इन सब उपायों को लागू करने के लिए शिक्षकों को सबसे आसान और उपलब्ध विकल्प समझा गया, क्योंकि वे स्कूल में उपस्थित भी रहते हैं और प्रशासनिक प्रणाली का हिस्सा भी हैं।यह सोच भले प्रशासनिक सुविधा दे, लेकिन यह शिक्षा की वास्तविकता को कमजोर करती है। क्या शिक्षकों को नोडल अधिकारी बनाना आवश्यक था? एक प्रशासनिक आलोचना इसको समझने की करें तो,सीईओ पुंछ और कुपवाड़ा द्वारा जारी आदेशों में शिक्षकों, हेडमास्टरों और प्रिंसिपलों को नोडल अधिकारी बनाकर कुत्तों की उपस्थिति रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।इस आदेश की आलोचना इसलिए बढ़ी क्योंकि(1) शिक्षक सुरक्षा विशेषज्ञ नहीं हैं (2) उन्हें पशुओं के व्यवहार की तकनीकी जानकारी नहीं (3) जोखिमपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना प्रशिक्षित व्यक्तियों का कार्य है। (4) नगर पालिका, पशुपालन और स्थानीय निकायों का यह मूल क्षेत्राधिकार है(5) शिक्षक संवेदनशील दैनिक कार्य कर रहे होते हैं,कुत्तों की निगरानी से उनकी कक्षा बाधित होगी, यह प्रशासनिक प्रक्रिया सरकारी विभागों की कमी को शिक्षकों पर थोपने का एक उदाहरण मानी जा रही है।

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